सफ़र

 

सफ़र, जो अंदर से शुरू होता है

रोहन की कहानी उसके अपने मुँह से सुनो तो लगता है जैसे पूरी दुनिया उसके खिलाफ़ साज़िश रच रही हो। "मेरे जैसा संघर्ष किसी ने नहीं झेला," वो अक्सर कहता। "पापा का साथ नहीं मिला, कॉलेज में सही गाइडेंस नहीं मिली, नौकरी में सही बॉस नहीं मिला — मेरी किस्मत ही खराब है।"

शुरुआत में लोग उसकी बात सुनते, सिर हिलाते, सहानुभूति जताते। "अरे यार, सच में तेरे साथ बहुत गलत हुआ।" रोहन को यह सुनकर एक अजीब सी राहत मिलती — जैसे किसी ने उसके दुख को मान्यता दे दी हो। धीरे-धीरे यही उसकी पहचान बन गई — "मैं वो हूँ जिसके साथ हमेशा गलत होता है।"

पहला मौका

कॉलेज के आखिरी साल में एक बड़ी कंपनी से इंटर्नशिप का ऑफर आया — ऐसा मौका जो बैच के बीस लोगों में से किसी दो-तीन को ही मिलता है। रोहन का नाम उसमें था। दोस्त खुश हुए, घरवाले खुश हुए। पर रोहन के अंदर एक अजीब सी बेचैनी शुरू हो गई।

अगर मैं वहाँ जाकर फेल हो गया तो? अगर सबको पता चल गया कि मैं उतना काबिल नहीं हूँ जितना दिखता हूँ?

यह डर इतना गहरा था कि उसने खुद को बचाने का एक अनजाना तरीका ढूंढ लिया — मेहनत ना करना। असाइनमेंट आखिरी रात में बनाना, मीटिंग्स में चुप बैठे रहना, सवाल न पूछना, सीनियर्स से सीखने की कोशिश न करना। मन ही मन उसका दिमाग एक तर्क गढ़ रहा था — "अगर मैंने पूरी कोशिश नहीं की और फेल हुआ, तो कम से कम यह नहीं कहूँगा कि मैं नाकाबिल हूँ। मैं तो कह सकूँगा कि मैंने कोशिश ही नहीं की, वरना कर लेता।"

तीन महीने बाद इंटर्नशिप खत्म हुई। कंपनी ने उसे परमानेंट ऑफर नहीं दिया।

बहानों की पहली परत

घर आकर उसने माँ से कहा, "मैनेजर मुझसे शुरू से ही जलता था। मुझे कभी सही प्रोजेक्ट दिया ही नहीं। बाकी इंटर्न्स को तो सब कुछ प्लेट में मिला, मुझे कुछ नहीं मिला।"

माँ ने सहानुभूति जताई। दोस्तों को बताया तो उन्होंने भी कहा, "यार, सिस्टम ही ऐसा है, कनेक्शन वालों को मौका मिलता है, मेहनत वालों को नहीं।"

रोहन को यह सुनकर सुकून मिला। उसे लगा जैसे उसकी बात को सबने मान लिया। पर गहराई में, वो खुद जानता था — रातों को जब वो अकेला होता, एक हल्की सी आवाज़ उसके अंदर से उठती — "क्या सच में सब कुछ उनकी वजह से हुआ था?" वह आवाज़ को दबा देता। स्वीकार करना बहुत मुश्किल था।

दूसरा मौका, वही पैटर्न

दो साल बाद, एक स्टार्टअप में नौकरी मिली। वहाँ के फाउंडर ने रोहन में कुछ खास देखा और उसे एक नए प्रोडक्ट लॉन्च की ज़िम्मेदारी दी। यह उसके करियर का सबसे बड़ा मौका था।

शुरुआत में रोहन उत्साहित था। पर जैसे ही असली काम शुरू हुआ — रिसर्च करनी थी, क्लाइंट्स से बात करनी थी, डेडलाइन के हिसाब से चलना था — वही पुराना डर लौट आया। इस बार भी उसने खुद को पूरी तरह नहीं झोंका। मीटिंग्स में देर से पहुँचता, ईमेल्स का जवाब टालता, टीम के सुझावों को गंभीरता से नहीं लेता।

फाउंडर ने एक दिन साफ़ शब्दों में कहा, "रोहन, तुम्हारे अंदर काबिलियत है, पर तुम पूरी ईमानदारी से कोशिश नहीं कर रहे। ऐसा क्यों?"

रोहन को यह सुनकर बुरा लगा। उसने जवाब में कहा, "सर, टीम मेरा साथ नहीं दे रही, संसाधन भी कम हैं, समय भी कम मिला।"

फाउंडर कुछ नहीं बोले, बस एक लंबी साँस ली।

प्रोडक्ट लॉन्च फ्लॉप हो गया। तीन महीने बाद रोहन को कंपनी छोड़नी पड़ी।

सहानुभूति का चक्र

इस बार रोहन ने सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट लिखी — "स्टार्टअप्स में यही होता है, मेहनत करने वालों की कोई कद्र नहीं। मैंने दिन-रात एक कर दिए, पर कोई फायदा नहीं हुआ।"

पोस्ट पर सैकड़ों लाइक्स आए। कमेंट्स में लोगों ने लिखा — "यार तुम बहुत टैलेंटेड हो, दुनिया तुम्हें समझ नहीं पाई," "हिम्मत मत हारो भाई, अगला मौका ज़रूर मिलेगा।"

रोहन को यह सब पढ़कर अच्छा लगा। यही वो पल था जब उसे एहसास हुआ कि उसे सहानुभूति की आदत हो गई है — हर बार जब वह गिरता, समाज से मिलने वाली हमदर्दी उसे थोड़ी देर के लिए अच्छा महसूस कराती। पर वह हमदर्दी उसकी असल समस्या को कभी हल नहीं करती थी। वह हर बार उसी जगह वापस आ जाता — बिना बदलाव के, बिना सीखे।

टूटता हुआ भ्रम

एक शाम, उसके पुराने दोस्त अमन ने उससे मिलने का समय माँगा। दोनों एक चाय की दुकान पर बैठे। रोहन ने फिर वही कहानी दोहरानी शुरू की — मैनेजर की गलती, फाउंडर की गलती, टीम की गलती, किस्मत की गलती।

अमन ने बीच में रोककर कहा, "रोहन, मैं तुम्हें दस साल से जानता हूँ। हर बार कहानी अलग होती है, पर पैटर्न एक जैसा है। जब भी मौका मिलता है, तुम पूरी ईमानदारी से कोशिश नहीं करते। और जब नतीजा बुरा आता है, तुम किसी और को ज़िम्मेदार ठहरा देते हो। फिर लोगों से सहानुभूति लेते हो, थोड़ी देर अच्छा महसूस करते हो, और वापस वहीं आ जाते हो जहाँ से शुरू किया था।"

रोहन गुस्से में बोलने ही वाला था, पर रुक गया। शायद पहली बार उसने अमन की बात को दबाया नहीं, सुना।

"तुम्हें क्या लगता है असली डर क्या है?" अमन ने पूछा।

रोहन कुछ देर चुप रहा, फिर धीमी आवाज़ में बोला — "शायद... मुझे डर है कि अगर मैंने पूरी कोशिश की और फिर भी असफल हुआ, तो मुझे मानना पड़ेगा कि कमी मुझमें है। इसलिए मैं हमेशा आधा-अधूरा प्रयास करता हूँ, ताकि कह सकूँ कि मैंने तो कोशिश की ही नहीं थी।"

यह पहली बार था जब उसने यह सच अपने मुँह से कहा।

नई शुरुआत

उस रात रोहन देर तक जागा। उसने अपने पिछले सारे मौके याद किए — इंटर्नशिप, स्टार्टअप, और भी छोटी-छोटी चीज़ें जहाँ उसने पूरी कोशिश नहीं की थी। हर बार की कहानी एक जैसी थी — डर, आधा प्रयास, बहाना, सहानुभूति, फिर वही डर।

उसने तय किया कि अगली बार जब कोई मौका आएगा, वह अपने डर को बहाना नहीं बनने देगा।

महीने भर बाद एक छोटा सा फ्रीलांस प्रोजेक्ट मिला — बड़ा नहीं, पर उसके लिए एक टेस्ट था। इस बार उसने समय पर काम शुरू किया, हर दिन थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ा, क्लाइंट के सवालों के जवाब समय पर दिए, गलतियाँ हुईं तो उन्हें छुपाया नहीं, सुधारा।

प्रोजेक्ट पूरी तरह परफेक्ट नहीं रहा। क्लाइंट ने कुछ सुधार सुझाए, कुछ आलोचना भी की। पर इस बार रोहन के मन में गुस्सा या बहाना नहीं आया। उसने सुधार किया, दोबारा भेजा।

काम खत्म होने के बाद रोहन ने आईने में खुद को देखा। हार का दुख नहीं था इस बार, ना ही जीत का जोश। बस एक शांत सी संतुष्टि थी — "इस बार मैंने पूरी ईमानदारी से कोशिश की। जो भी नतीजा आया, वो मेरी असली मेहनत का नतीजा है, किसी बहाने का नहीं।"

वह जानता था कि यह सफ़र लंबा है, और पुराना डर कभी-कभी लौटकर आएगा। पर पहली बार उसे लगा कि वह अपने हालात का शिकार नहीं, बल्कि अपने फैसलों का मालिक है।

और शायद यही वो पहला सच्चा कदम था — जहाँ से बदलाव अंदर से शुरू होता है, बाहर की सहानुभूति से नहीं।

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