सेवक या मालिक
गाँव का नाम था रामपुर। वहाँ एक लड़का था, मोहन, जो बचपन से गाँव की चौपाल पर बैठे बुज़ुर्गों की बातें सुना करता था। एक दिन उसने पूछा — "बाबा, राजा और प्रजा में फ़र्क़ क्या होता है?"
बुज़ुर्ग मुस्कुराए और बोले — "फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है, बेटा, कि राजा भूल जाता है कि उसे प्रजा ने ही बनाया है।"
बीस साल बाद मोहन खुद पंचायत का प्रधान बना। गाँव वालों ने उसे इसलिए चुना था क्योंकि वह उन्हीं के बीच का था — खेत जोतता, कुआँ खोदता, सबके दुख-सुख में शामिल होता। पहले साल उसने स्कूल की छत ठीक करवाई, दूसरे साल हैंडपंप लगवाए। लोग कहते — "मोहन तो सेवक निकला, असली सेवक।"
पर वक़्त के साथ कुछ बदलने लगा। अब मोहन की कुर्सी के आगे एक मेज़ आ गई थी, मेज़ के आगे एक चौकीदार खड़ा रहने लगा था। जो गाँव वाला कभी उसके घर बेझिझक चला जाता था, अब उसे "साहब से मिलने का वक़्त" माँगना पड़ता था। मोहन के बेटे को शहर के महँगे स्कूल में भेजा गया, फिर विदेश पढ़ने। गाँव का स्कूल वैसा ही टूटा-फूटा रह गया जैसा बीस साल पहले था, बस अब उसकी दीवार पर मोहन की तस्वीर लगी थी।
एक दिन वही बुज़ुर्ग, जो अब बहुत बूढ़े हो चुके थे, लाठी टेकते हुए पंचायत भवन आए। चौकीदार ने रोका — "साहब मीटिंग में हैं।"
बुज़ुर्ग हँसे, वहीं सीढ़ी पर बैठ गए और बोले — "जा के कह देना, वो बूढ़ा आया है जिसने बीस साल पहले इसे बताया था कि राजा और प्रजा में फ़र्क़ क्या होता है। पूछना है, अब वो फ़र्क़ भूल तो नहीं गया?"
अंदर से मोहन की आवाज़ आई नहीं। बस थोड़ी देर बाद माइक पर एक घोषणा गूँजी — "आज की सभा में हम अपनी संस्कृति, अपनी विरासत की रक्षा पर चर्चा करेंगे। हमें अपनी परंपराओं पर गर्व होना चाहिए।"
बुज़ुर्ग उठे, धूल झाड़ी, और चलते-चलते बड़बड़ाए — "परंपरा की बात करने वाले, परंपरा को जीते नहीं। बस उसका बाजा बजाते हैं, ताकि तालियाँ बजती रहें, और कुर्सी बनी रहे।"
वो चला गया। पीछे मेज़ पर रखी मलाई अभी भी कटोरे में थी — कोई और उसे चाटने के लिए आ चुका था।
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