बहाने

 

रोहन हमेशा कहता था, "मेरी ज़िंदगी में जितनी मुश्किलें हैं, उतनी किसी की नहीं।" दफ़्तर में, दोस्तों के बीच, घर पर — हर जगह उसकी यही कहानी होती। लोग शुरू में सुनते, सहानुभूति जताते, फिर धीरे-धीरे उसकी बात हवा में उड़ा देते।

एक दिन उसकी कंपनी में एक बड़ा प्रोजेक्ट आया — एक ऐसा मौका जो साल में एक बार आता है। मैनेजर ने रोहन को टीम लीड बनाने का प्रस्ताव रखा। रोहन के अंदर एक पल के लिए खुशी की लहर दौड़ी, फिर तुरंत डर ने घेर लिया — अगर मैं असफल हो गया तो?

उसने हामी तो भर दी, पर दिल से नहीं। प्रेजेंटेशन आधी-अधूरी तैयार की। मीटिंग्स में देर से पहुँचता। टीम के सवालों के जवाब टाल देता। उसका मन कहता रहा — "पूरी मेहनत करूँगा तो भी क्या फ़र्क पड़ेगा, हालात तो मेरे खिलाफ़ ही रहते हैं।"

नतीजा वही हुआ जो होना था। प्रोजेक्ट किसी और को सौंप दिया गया।

उस रात रोहन ने अपने दोस्त अमन को फोन किया। "यार, मुझे पता था ये होगा। मैनेजर की तो पहले से ही मुझसे नहीं बनती। मुझे मौका मिला भी तो बीच में ही छीन लिया गया।"

अमन कुछ देर चुप रहा, फिर बोला — "रोहन, सच बताऊं? मैंने तुम्हारा ड्राफ्ट देखा था। आधा-अधूरा था। तुम मीटिंग्स में लेट आते थे। ये मैनेजर की गलती नहीं थी।"

रोहन को गुस्सा आया। "तुम भी उन्हीं की तरफ हो गए? कोई मेरी बात नहीं समझता।"

अमन ने धीरे से कहा, "मैं तुम्हारी बात समझता हूँ, इसीलिए सच बोल रहा हूँ। तुम हर बार मौका आने पर आधा मन लगाते हो, और फिर हालात को दोष देते हो। कब तक ऐसे चलेगा?"

फोन कटने के बाद रोहन देर तक खिड़की के पास बैठा रहा। पहली बार उसने खुद से एक अलग सवाल पूछा — "क्या सच में हालात ने मुझे रोका, या मैंने खुद को कभी पूरी तरह आज़माया ही नहीं?"

जवाब असहज था, पर सच था।

अगले महीने एक और छोटा प्रोजेक्ट आया — इतना बड़ा नहीं, पर रोहन ने इस बार ठान लिया। समय पर पहुँचा, रातों को जागकर तैयारी की, गलतियाँ मानीं, सुधारीं। डर अब भी था, पर इस बार उसने डर को बहाना नहीं बनने दिया।

प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल तो नहीं रहा, पर पहली बार रोहन को हार का दुख नहीं, बल्कि एक अजीब सा सुकून मिला — "इस बार कम से कम मैंने पूरी कोशिश की थी।"

और शायद यही वो पहला कदम था, जहाँ से असली बदलाव शुरू होता है।

Comments

Popular posts from this blog

सेवक या मालिक

We, the Virus: Rethinking Human Superiority