सुमित

सुमित नारंग सोसाइटी के गेट के बाहर खड़ा था, हाथ में वही रिजेक्शन लेटर, तीसरी बार। "क्रिमिनल बैकग्राउंड की वजह से आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता" — शब्द वही, बस कागज़ अलग-अलग जगहों के।

पाँच साल पहले, बीस की उम्र में, गुस्से के एक पल ने उसे थाने तक पहुँचा दिया था। सज़ा भुगत ली, माफी माँग ली, ज़िंदगी सुधार ली — पर वो एक दाग उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था। मॉल की नौकरी गई, फिर बैंक के बाहर सिक्योरिटी की नौकरी गई, अब सोसाइटी की भी।

रात को घर लौटा तो छोटे भाई ने टीवी पर उंगली से इशारा किया — "भैया देखो, नए मंत्री जी की शपथ हो रही है।" स्क्रीन पर एक चेहरा चमक रहा था, जिस पर हत्या के प्रयास और दंगा भड़काने जैसे दर्जन मुकदमे दर्ज थे। फिर भी उन्हें गृह मंत्रालय सौंपा जा रहा था — देश की कानून-व्यवस्था की चाबी। स्टूडियो तालियों से गूँज रहा था, कोई सवाल नहीं, कोई विरोध नहीं।

सुमित की आँखों में एक हल्की, थकी हुई हँसी आ गई। उसने भाई से कहा, "देख भाई, मुझे एक गेट की चौकीदारी के लायक नहीं समझा गया, और ये साहब पूरे मुल्क की चौकीदारी करने चले हैं।"

रात को वह छत पर अकेला बैठा रहा। उसने फोन की नोट्स ऐप खोली और लिखा —

"शायद कमी मुझमें नहीं, इस सोच में है। हम एक चौकीदार से बेदाग अतीत माँगते हैं, पर जिसके हाथ में पूरी व्यवस्था सौंपते हैं, उससे कुछ नहीं पूछते। जिस दिन जनता नेता को भी उसी तराज़ू पर तौलना सीख जाएगी, जिस तराज़ू पर मुझ जैसों को तौला जाता है — शायद उस दिन असली इंसाफ शुरू होगा।"

उसने फोन बंद किया, आसमान की तरफ देखा, और मन ही मन तय किया — हार नहीं माननी। कोई दरवाज़ा, कहीं न कहीं, ज़रूर खुलेगा — जो उसके अतीत को नहीं, उसकी नीयत और मेहनत को देखेगा।

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